ग़ालिब की शायरी.best selected shayari of mirza ghalib

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                                                  ग़ालिब की शायरी
हाथों की लकीरों पे मत जा गालिब🖐 नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते👀🙂🙂 
ग़ालिब की शायरी





 हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है😦 वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता😌🙂🙂



हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन😌  दिल के खुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़्याल अच्छा है😊😊🙂


रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब'😊 कहते हैं अगले ज़माने में कोई 'मीर' भी था🙂🙂🙂



बाज़ीचा--अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे😎 होता है शब--रोज़ तमाशा मिरे आगे🙄🙂🙂
ग़ालिब की शायरी




यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं🙄 अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो🙄🙂🙂 


निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन😎 बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले😶🙂🙂



बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता। वगर्ना शहर में "ग़ालिब" की आबरू क्या है🙂🙂🙂


रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज।  मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं🙂🙂🙂
ग़ालिब की शायरी




इशरत--क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना।  दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना🙂🙂🙂



दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई।  दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई🙂🙂🙂



गुनाह कर के कहाँ जाओगे ग़ालिब ये ज़मी ये आसमान सब उसी का है🙂🙂🙂



मेरे बारे में कोई राय मत बनाना गालिब मेरा वक़्त भी बदलेगा तेरी राय भी🙂🙂🙂
ग़ालिब की शायरी




बेवजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रुलाते ज़रूर है🙂🙂🙂



मंज़िल मिलेगी भटक कर ही सही गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं🙂🙂🙂



हम तो फना हो गए उनकी आँखे देख कर ग़ालिब  जाने वो आइना कैसे देखते होंगे🙂🙂🙂



रहने दो मुझे इन अंधेरों में ग़ालिब कमब्खत रौशनी में अपनों के  असली चेहरे सामने जाते है🙂🙂🙂
ग़ालिब की शायरी




इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया वरना हम भी आदमी थे काम के🙂🙂🙂



गुजर जायेगा ये दौर भी ग़ालिब ज़रा इत्मीनान तो रख जब ख़ुशी ना ठहरी तो गम की क्या औकात है🙂🙂🙂



मंज़िल मिलेगी भटक कर ही सही गुमराह तो वो हैं जो घर से निकले ही नहीं🙂🙂🙂 


किसी की क्या मजाल थी जो कोई हमें खरीद सकता हम तो खुद ही बिक गए खरीददार देखकर🙂🙂🙂
ग़ालिब की शायरी




वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़ सिवाए बादा--गुल्फ़ाम--मुश्कबू क्या है🙂🙂🙂


पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार ये शीशा--क़दह--कूज़ा--सुबू क्या है🙂🙂🙂


रही ताक़त--गुफ़्तार और अगर हो भी तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है🙂🙂🙂


बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता वगर्ना शहर में "ग़ालिब" की आबरू क्या है🙂🙂🙂
ग़ालिब की शायरी



ये हम जो हिज्र में दीवार--दर को देखते हैं कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं🙂🙂🙂


वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
 कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं🙂🙂🙂




नज़र लगे कहीं उसके दस्त--बाज़ू को ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं🙂🙂🙂


तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें हम औजे तअले लाल--गुहर को देखते हैं🙂🙂🙂
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